शरद का लालू पर बकाया कर्ज क्यों याद दिला रहे शिवानंद?

बिहार की सियासत में पुरानी दोस्ती और कर्ज की बातें फिर से चर्चा में हैं। राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी ने लालू प्रसाद यादव को एक पुराना “सियासी कर्ज” याद दिलाया है, जो 1990 में शरद यादव ने लालू को मुख्यमंत्री बनवाने में मदद करके चुकाया था। यह बात तब उभरी जब 2025 के विधानसभा चुनाव में मधेपुरा सीट से शरद के बेटे शांतनु को टिकट नहीं मिला। आइए, जानते हैं इस कर्ज की कहानी और इसके पीछे की सियासत।
1990 का वो ऐतिहासिक कर्ज
शिवानंद तिवारी ने अपने एक भावुक संदेश में कहा कि लालू अगर चाहते तो शांतनु को टिकट देकर शरद यादव के उस कर्ज से मुक्त हो सकते थे, जिसने उन्हें बिहार की सत्ता तक पहुंचाया। बात 1990 की है, जब जनता दल ने 132 सीटें जीतकर बिहार में सरकार बनाई। लालू, जो मधेपुरा से लोकसभा सांसद थे, मुख्यमंत्री बनने की दौड़ में थे। लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह इसके खिलाफ थे। सिंह चाहते थे कि दलित नेता राम सुंदर दास मुख्यमंत्री बनें, क्योंकि लालू विधानसभा सदस्य नहीं थे।
लालू ने हार नहीं मानी। उन्होंने विधानसभा दल के नेता का चुनाव करवाया। इस मुकाबले में शरद यादव ने लालू का साथ दिया। देवीलाल और मुलायम सिंह यादव ने भी लालू के पक्ष में माहौल बनाया। वोटिंग में जातिगत समीकरण काम आए—पिछड़ी जातियों का समर्थन लालू को मिला, और वे राम सुंदर दास और रघुनाथ झा को हराकर जीते। इसके बाद भी गवर्नर को दिल्ली बुलाकर शपथ में अड़चन डाली गई, लेकिन देवीलाल की मदद से 10 मार्च 1990 को लालू गांधी मैदान में मुख्यमंत्री बने। तिवारी कहते हैं कि शरद का यह समर्थन ही वो “कर्ज” था, जिसे लालू भूल गए।
शांतनु को टिकट न मिलने से नाराजगी
शरद यादव का निधन हो चुका है, और उनके बेटे शांतनु उनकी सियासी विरासत को आगे बढ़ाना चाहते थे। लंदन से पढ़ाई कर लौटे शांतनु मधेपुरा से टिकट की उम्मीद कर रहे थे, लेकिन आरजेडी ने यह सीट किसी और को दे दी। शिवानंद ने शांतनु की मां रेखा यादव से बात की, जो इस फैसले से बहुत दुखी हैं। तिवारी ने इसे लालू के “परिवारवाद” का उदाहरण बताया, जहां तेजस्वी जैसे परिवार के लोग प्राथमिकता पाते हैं, लेकिन पुराने समाजवादी साथियों की विरासत को नजरअंदाज किया जाता है।
लालू-शरद की दोस्ती: शुरुआत से दरार तक
1970 के दशक में लालू और शरद समाजवादी आंदोलन में साथ थे। राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण की विचारधारा पर दोनों ने बिहार की सियासत को दिशा दी। लेकिन 1997 में चारा घोटाले के बाद जनता दल टूटा। शरद ने लालू से इस्तीफा मांगा, और लालू ने आरजेडी बनाई। शरद 2017 तक जेडीयू में नीतीश के साथ रहे, फिर बीजेपी गठबंधन के खिलाफ अलग हुए। 2020 में उन्होंने अपनी पार्टी को आरजेडी में मिला दिया। अब शांतनु को टिकट न मिलने से पुरानी दोस्ती की कड़वाहट फिर उभर आई है।
2025 चुनाव से पहले क्यों उठा यह मुद्दा?
बिहार में 2025 का चुनाव नजदीक है, और यह विवाद आरजेडी में अंदरूनी तनाव को दिखाता है। पुराने समाजवादी लालू के परिवार-केंद्रित फैसलों से नाराज हैं। नीतीश कुमार ने हाल ही में रैली में लालू के “परिवारवाद” पर तंज कसा, जैसे राबड़ी देवी को 7 साल तक मुख्यमंत्री बनाए रखना। तिवारी का यह बयान न सिर्फ शरद की विरासत को सम्मान देने की बात है, बल्कि यह भी संदेश देता है कि आरजेडी को समाजवादी आदर्शों की ओर लौटना चाहिए। यह सियासी जंग में विपक्षी एकता को भी प्रभावित कर सकता है।

Read Previous

बिहार चुनाव 2025: तेजस्वी ने कैसे ठोकी महागठबंधन में धाक, क्या अब सत्ताधारी गठबंधन को उखाड़ फेंकेंगे?

Read Next

ओपनएआई का चैटजीपीटी एटलस ब्राउजर लॉन्च

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Most Popular